Friday, December 10, 2010

दिनांक 26 जुलाई, 2010 को ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास एवं सामाजिक परिवर्तन संस्थान, पटना के सभागार में संस्थान के एम॰बी॰ए॰ एम॰सी॰ए॰ 2010-12 पाठ्यक्रम सत्र के शुभारंभ के अवसर पर डा॰ जगन्नाथ मिश्र का सम्बोधन।
विगत वर्षों में हमारे देश में प्रबंधन षिक्षा का पर्याप्त विस्तार हुआ है। इन वर्षों में प्रबंधन षिक्षा के दु्रत विकास के क्रम में यदा-कदा गुणवत्ता और स्तरीयता की अल्पता उत्पन्न हुई जिस कारण से मानव संसाधन की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। गुणवत्ता, प्रभाव एवं प्रासंगिकता ऐसे महत्वपूर्ण तत्त्व हैं, जिनके माध्यम से समाज प्रबंधन षिक्षा की कामयाबी को मापता है। यू॰जी॰सी॰ के द्वारा आयोजित एक सर्वेक्षण से यह प्रकाष में आया है कि लगभग सभी सूचकों पर यथा निकाय के स्तर, पुस्तकालयीय सुविधायें, संगणक (कम्प्यूटर) की उपलब्धता, शिक्षक-छात्र का अनुपात आदि- प्रबंधन षिक्षा को यथाषीघ्र समुन्नत करना अत्यावष्यक है। आज यह जबरदस्त भावना हो गयी है कि विश्वविद्यालयों और काॅलेजों से प्रबंधन स्नातकोत्तर उत्तीर्ण की कुषलता जाॅब मार्केट की अपेक्षाओं से मेल नहीं खाती हैं, ये प्राप्त षिक्षा (डिग्री) के अनुपात में कत्र्तव्य पर खरे नहीं उतरते हैं। एक ओर तो हम षिक्षित बेरोजगारों की इतनी बड़ी संख्या नहीं चाहते और दूसरी ओर हमारे पास जो कार्य (जाॅब) हैं उनके लिये अनुकूल उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हैं। हमारे जैसे विकासषील देष में नियोजन की दृष्टि से अयोग्य प्रबंधन स्नातक बेकारी की समस्या से भी बड़ी समस्या प्रस्तुत कर देते हैं। आज के स्पर्धा भरे वातावरण की मांग है प्रबंधन षिक्षा की उत्कृष्टतर गुणवत्ता/ राष्ट्रीय एवं विष्व-बाजार में केवल वे ही संस्थायें प्रतियोगिता में आने की स्थिति में होंगी जो निरंतर गुणवत्तापूर्ण षिक्षा प्रदान करें। यह कहा जाता है कि गुणवत्ता नागरिकों की गुणवत्ता पर आश्रित होती है। और, नागरिकों की गुणवत्ता उनकी षिक्षा पर निर्भर करती है। ये बातें प्रबंधन षिक्षा के मामले में खासतौर से सच्ची पायी जाती हैं। राष्ट्रीय एवं विष्व बाजार की प्रतियोगिता में सफल होने के लिये यह अनिवार्य है कि हमारी प्रबंधन उच्च षिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता का सम्वर्द्धन किया जाय।
प्रबंधन षिक्षा की गुणवत्ता सम्बर्द्धित करने हेतु किसी विष्वविद्यालय एवं स्वायत्त संस्थानों को वृहत् धनराषि की जरूरत होती है। षैक्षिक और भौतिक आधारभूत संरचना यथा कक्षाओं और प्रयोगषालाओं, पुस्तक भंडार को अद्यतन करना, पुस्तकालय में पत्रिका, संदर्भ सामग्री और षिक्षकों-षिक्षकेतर कर्मचारियों के वेतन-भुगतान आदि की गुणवत्ता संवर्द्धित करने हेतु हमें धनराषि की जरूरत है। हमें धनराषि तबतक नहीं प्राप्त होगी जबतक हम विष्वविद्यालय, सरकार एवं अन्य श्रोतों द्वारा किये गये व्यय की उपयोगिता उच्च स्तरीय गुणवत्ता के परिणाम स्वरूप नहीं सिद्ध करते हैं। एक ऐसे तंत्र को विकसित करना ही है जो प्रबंधन षिक्षा की गुणवत्ता को निरंतर आकलित और संधारित करता रहे।
प्रबंधन षिक्षा की गुणवत्ता और प्रासंगिकता से संबंधित एक दूसरा मुद्दा है जो प्रबंधन षिक्षा की आंतरिक और वाह्य उत्पादकता के बारे में है। वे, जो प्रबंधन षिक्षा की गुणवत्ता से मतलब रखते हैं अपने मानकों, यथा अंक, प्रकाषन आदि का उपयोग कर इस पर (गुणवत्ता पर) मात्र आंतरिक परिप्रेक्ष्य से देखते रहे हैं। किन्तु उद्योग और अन्य आर्थिक क्षेत्र (सेक्टर) जिन्हें अपनी उत्पादन प्रणाली में छात्रों की जरूरत है, लब्धांक या प्राप्त प्रतिभा प्रमाणपत्रों से अधिक हैं; ये मूलतः प्राप्त ज्ञान और कुषलता से मतलब रखते हैं। ये लक्षित परिणाम उत्पादित करने हेतु कुछ क्रियाकलापों के संपादन में छात्रों को लगाना चाहते हैं। ये अपने व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य से, न कि छात्रों के षैक्षिक ज्ञान के आधार पर, गुणवत्ता को परखते हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रबंधन षिक्षा की गुणवत्ता दो भिन्न मार्गों से समझी जाती हैः-(1) संस्था के आंतरिक परिप्रेक्ष्य से और (2) उस बाजार के वाह्य परिप्रेक्ष्य से, जिसमें ये स्नातक/स्नातकोत्तर नियोजित किये जा सकेंगे। वे संस्थायें जो गुणवत्ता का आकलन अपने-अपने आंतरिक कार्य संचालन के आधार पर करती हैं, उद्योगजगत् द्वारा वांछित गुणवत्तापरक अर्हताओं को पूर्ण नहीं करती हैं। संस्थानों कालेजों और विष्वविद्यालयों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने हेतु प्रयुक्त षत्र्तों में ये बिन्दु सम्मिलित हैं- (अ) पाठ्यक्रम पहलू (आ) अध्यापन, सीखना और मूल्यांकन (इ) षोध, परामर्ष और प्रसार (ई) आधारभूत संरचना (उ) छात्र-साहाय्य (ऊ) संगठन और प्रबंधन (ए) स्वास्थ क्रियाकलाप। उपर्युक्त षर्तों का प्रयोग संस्थाओं की गुणवत्ता के आकलन में किया जाता है। दूसरी ओर उद्योगजगत् की अभिरूचि ऊपर वर्णित उस व्यक्ति में है, जो व्यक्ति वस्तुयें उत्पादित कर सकता है। इसलिये षिक्षा की गुणवत्ता या षिक्षा के मानक जो छात्रों से अपेक्षित हैं वे उद्योगतजगत् के अपने दायरे में हैं। अस्तु, ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर वृहत्तर विचारण एवं चर्चा आवष्यक हैं। षिक्षा एवं प्रबंधन षिक्षा को बुनियादी जरूरत माना जाता है। भारत की आजादी के बाद यहां की हर सरकार घोषित रूप से ही सही षिक्षा के प्रसार की दिषा में कई योजनाएं बनाती रही है। हालांकि इस बात पर हमेषा सवाल उठता रहा है कि इन योजनाओं के अमल में कितनी ईमानदारी बरती जाती है। लेकिन इस बात को स्वीकार करने में किसी को कोई एतराज नहीं होनी चाहिए कि प्रबंधन षिक्षा का प्रसार हुआ है। पर अपेक्षित और आवष्यक प्रसार प्रबंधन षिक्षा के क्षेत्र में नहीं हो पाया है। इस अवसर पर यह कहना बड़ा ही समीचीन होगा कि एक दृष्टिकोण है कि प्रबंधन षिक्षा संख्या की दृष्टि से गुणवत्ता की कीमत पर बहुत विस्तृत हुई है और प्रबंधन षिक्षा की गुणवत्ता क्रमषः अधोगति प्राप्त करती रही है। लोग अभी भी महसूस करते हैं कि भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देष में षिक्षा तक पहुँच या इसका अधिकाधिक विस्तार अभी भी एक प्राथमिकता है। षिक्षा में षिक्षक उन चुनौतियों को देखते हैं जो इस अंतद्र्वन्द्व से उत्पन्न हुई हैं। किसी भी राष्ट्र के लिए यह हितकर नहीं होगा कि प्रबंधन षिक्षा के विस्तार को उपेक्षित किया जाय। लेकिन तकनीकी विकास के इस युग में गुणवत्ताविहीन प्रबंधन षिक्षा मजाक बनकर रह जाती है। सबों के लिए गुणवत्तापरक षिक्षा राष्ट्र के समक्ष एक साहसिक कार्यभार है। संविधान के प्राक्कथन में और मौलिक अधिकारों से संबद्ध भाग में ही अंकित है कि समानतापूर्वक जीने का अधिकार और सामाजिक न्याय के साथ जीने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है। यह अधिकार इस अधिकार की पूरी गारंटी है और इसका उच्च से उच्च अर्थ है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा इस आधिकार की आधिकारिक व्याख्या की गई है; जिसका अर्थ है-सम्मान और समानतापूर्ण जीवन स्तर और अवसर जो जीने के अधिकार से संबंधित है। इस व्याख्या में यह भी अंकित है कि षिक्षा मानवीय सम्मान का अति महत्वपूर्ण अंग है और इसलिए षिक्षा संविधान के मौलिक अधिकार में सन्निहित है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो॰ अमत्र्य सेन ने षिक्षा को विकसित करने के लिए प्रत्येक स्तर पर सर्वांगीण गुणवत्ता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि षिक्षा से ही किसी राष्ट्र का वास्तविक विकास संभव हो पाता है क्योंकि विषिष्ट षिक्षा से ही किसी राष्ट्र को अच्छे इंजीनियर, प्रबंधक, डाक्टर, व्यवसायी, अधिवक्ता, लेखा विषेषज्ञ, आचार्य (प्रोफेसर) तथा सभी क्षेत्रों से संबंधित कुषल तकनीकी कर्मियों की उपलब्धता सुनिष्चित की जा सकती है। अतः निष्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि विषिष्ट षिक्षा को विकसित करने में व्यय धनराषि अनुत्पादक निवेष नहीं है बल्कि दीर्घकालिक रूप में एक उत्पादक निवेष है। कहने की जरूरत नहीं कि षिक्षा के प्रति नयी जागरूकता के बावजूद काम अभी बाकी है। तमाम अभियानों-कार्यक्रमों के बावजूद आज भी देष में लगभग 36 करोड़ लोग षिक्षा से वंचित हैं। राष्ट्रीय षिक्षा नीति 1986 में षिक्षा के मद में सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिषत आवंटन की जरूरत रेखांकित की गयी थी पर यह आजतक नहीं हो सका। 1990 के दषक के दौरान प्रारंभिक षिक्षा पर चालू सार्वजनिक खर्च सकल घरेलू उत्पाद के 1.69 से घटकर 1.47 प्रतिषत पर प्रारंभिक षिक्षा को प्राथमिकता देना षोर के बीच ही पहुँच गया। इक्कीसवीं सदी के विष्व में बुनियादी परिवर्तन हो रहा है। इसमें पूंजी, षक्ति तथा वर्चस्व की परिभाषा बदल रही है। आज का समाज ‘ज्ञान का समाज’ है। स्वभावतः बाजार भी ‘ज्ञान का बाजार’ है। आज मानव जाति षिक्षा को एक अपरिहार्य संपदा के रूप में देख रही है। षिक्षा व्यक्तिगत एवं सामाजिक विकास की मूलभूत भूमिका में सामने आ रही है। किसी भी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र की षक्ति का निर्धारण उसके ज्ञान की पूंजी के आधार पर होगा। ‘ज्ञान और सूचना’ विष्व की सर्वोत्तम पूंजी बनने वाली है। नई सदी में विष्व के राष्ट्रों ने अपनी कार्य-योजना पर काम करना षुरू कर दिया है। कई विकसित राष्ट्रों ने मानव संसाधन के विकास की अपनी योजना, संसाधन और आवष्यकता की समीक्षा की है। मानव संसाधन की आवष्यकता के परिप्रेक्ष्य में कई राष्ट्रों में पहले से ही काम चल रहे हैं। सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग प्रबंधन एवं तकनीकी षिक्षा हासिल करें। इससे उनके लिए देष में ही नहीं विदेषों में भी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक अध्ययन के अनुसार 14 करोड़ बच्चे प्राथमिक षिक्षा में प्रवेष लेते हैं। पांचवीं पास करते-करते इनमें से 50-55 फीसदी बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। यों करीब 7 करोड़ बच्चे मिडिल स्कूलों में पहुँचते हैं। लेकिन आठवीं पास करते-करते 60 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। नौंवीं एवं दसवीं कक्षाओं में स्कूल प्रवेष दर (जीईआर) 40 फीसदी ही है। जबकि 14-18 साल के उम्र वर्ग में अभी करीब 9.70 करोड़ बच्चे हैं। मतलब यह हुआ कि इनमें से साढ़े तीन करोउ़ बच्चे ही नौंवी में प्रवेष ले पाते हैं। दसवीं पास करने के बाद 11वीं यानी उच्चतर माध्यमिक में प्रवेष की दर और भी कम महज 28 फीसदी है। अनुमान है कि करीब 2.5 करोड़ बच्चे ही उच्चतर माध्यमिक की पढ़ाई करते हैं। इन छात्रों को यदि विज्ञान, कामर्स, आट्र्स और अन्य विषयों की पढ़ाई के हिसाब से विभाजित कर दें तो साइंस पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 70-75 लाख के करीब बैठती है। दूसरी तरफ सरकार का लक्ष्य अगले पांच सालों में 1.20 करोड़ छात्रों को प्रतिवर्ष तकनीकी प्रबंधन और वोकेषनल षिक्षा देने का है। अभीतक तो स्थिति यह है कि इन 25 लाख तकनीकी सीटों में भी इंजीनियरिंग, प्रबंधन, डेंटल, नर्सिंंग आदि में 10-20 फीसदी सीटें प्रतिवर्ष खाली रह जाती हैं। इसका कारण है कि स्टूडेंट नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में सरकार के लिए चुनौती है कि सीटें बढ़ाने के साथ-साथ एडमिषन के लिए छात्रों की संख्या में भी इजाफा किया जाए। ज्यादा से ज्यादा लोग तकनीकी कोर्स करें, इसके लिए स्टूडेंट को तो आकर्षित किया ही जा रहा है, लेकिन बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी पारिवारिक जरूरतों के चलते कम उम्र में काम धंधे में लग जाते हैं। या पहले कोई दूसरा कोर्स कर चुके होते हैं, लेकिन जब वे प्रबंधन, डाक्टरी या इंजीनियरिंग पढ़ना चाहते हैं तो उनकी उम्र निकल चुकी होती है। अब तकनीकी कोर्स करने के लिए सरकार अधिकतम आयु सीमा के प्रावधान को भी खत्म करने जा रही है। यानी किसी भी उम्र में इंजीनियरिंग और डाक्टरी की पढ़ाई की जा सकेगी। अभी प्रबंधन और कानून की पढ़ाई के लिए अधिकतम उम्र की कोई सीमा तय नहीं है। बाकी सभी कोर्स के लिए अधिकतम उम्र सीमा निर्धारित है। पेषेवर कोर्स की सीटें 25 लाख से बढ़ाकर 1.20 करोड़ करने के लिए व्यापक बुनियादी ढांचे की भी जरूरत पड़ेगी। सरकार की तरफ से आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम, एम्स आदि खोले जा रहे हैं। इसके बावजूद भी कमी बरकरार रहेगी। प्रबंधन षिक्षा की बेहतर व्यवस्था के जरिये रोजगार क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रचूर संभावनाएं हैं। प्रबंधन एवं तकनीकी षिक्षा तंत्र में ज्यादा स्वायत्तता, स्वतंत्रता और लचीलेपन की जरूरत है। प्रबंधन षिक्षा सृजनात्मक, उपयोगी, असरदार और प्रासंगिक होनी चाहिए। वास्तव में, हमें जिन इंजीनियरों, प्रबंधक एवं तकनीकी प्रषिक्षित लोगों की दरकार है वह नयी विधाओं में है और हम अपनी आवष्यकतानुसार इंजीनियर, प्रबंधक एवं तकनीकी प्रषिक्षित लोग तैयार नहीं कर पा रहे हैं। चूंकि राज्य में समुचित सुविधाएं और संस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं, इसलिये बड़ी संख्या में प्रखर बुद्धि युवा विभिन्न विधाओं, विषेषकर सूचना प्रौद्योगिकी में, इंजीनियरी एवं प्रबंधन षिक्षा राज्य के बाहर में प्राप्त करते हैं। वे प्रमुखतः बंगलौर, हैदराबाद, पुणे और चेन्नई जाते हैं और अधिकतकर वापस न लौटकर अन्यत्र रोजगार ढूंढ़ लेते हैं। जहांतक प्रबंधन एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में निजी संस्थानों की बहुतायत की बात है, आवष्यक है कि उनके ऊपर पाठ्यक्रम स्तर और श्रेणीकरण पर सामान्य नियंत्रण हो। ऐसे नियंत्रण की प्रकृति के निर्धारण के लिये विषेष अध्ययन और उसके षीघ्र क्रियान्वयन की जरूरत है। प्रबंधन षिक्षा को रोजगारोन्मुख और रोजगारपरक बनाए जाने की जरूरत है। षिक्षा को ज्यादा उपयोगी कौषल से युक्त और साथ ही साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने वाली षिक्षा बनाने के लिये रणनीति अपनाए जाने की जरूरत है। षिक्षण प्रणाली में उद्यमषीलता के महत्व और काॅलेज षिक्षा के स्तर से ही छात्रों को उद्यमों की स्थापना के प्रति उन्मुख करने पर जोर दिया जाना चाहिए जिससे उन्हें धन अर्जित करने के लिये क्रियाषीलता, स्वतंत्रता और सामथ्र्य प्राप्त हो।
(डा॰ जगन्नाथ मिश्र)
दिनांक 27 जुलाई, 2010 को नेचुरल हेल्थ मिषन के तत्वावधान में इंडियन मेडिकल एसोसियेषन हाॅल में प्रथम नेषनल मेगा हेल्थ सेमिनार में डा॰ जगन्नाथ मिश्र का सम्बोधन।
दुनिया भर में स्वस्थ जीवन, सुदीर्घ आयु और इनके लिए जरूरी स्वास्थ्य एवं पोषण सुविधाओं की उपलब्धता को विकास का मापदंड माना गया है। वस्तुतः किसी भी देष-समाज के समग्र आर्थिक क्रियाकलापों की नाभि उसमें रहने वाले मनुष्य की षारीरिक और मानसिक बेहतरी होती है। यह बेहतरी न केवल व्यक्तियों को निजी उपलब्धियां दिलाने का माध्यम बनती है, बल्कि वह देष-समाज को भी नई ऊंचाईयां और उपलब्धियां प्रदान करती है। लेकिन यह तभी संभव है जब उस देष में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं विष्वसनीय और सहज-सुलभ हों। अतः किसी भी आधुनिक देष की सरकार के लिए अपने नागरिकों को स्तरीय, प्रामाणिक, विष्वसनीय और सर्वसुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही स्वास्थ्य को सामाजिक-आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण घटक मानते हुए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए हैं।
रोटी, कपड़ा और मकान के बाद मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण आवष्यकता अच्छे स्वास्थ्य की होती है। इसीलिए कहा गया है, ‘‘स्वस्थ षरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है।’’ इस कथन से जीवन में स्वास्थ्य की भूमिका स्वयं प्रमाणित होती है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, असमानता, भौगोलिक दूरी, प्राकृतिक विविधता, षैक्षिक पिछड़ापन, अंधविष्वासों की जकड़न जैसी विपरीत परिस्थितियों में सभी को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। आजादी के बाद से ही भारत सरकार इस चुनौती पर काबू पाने का प्रयास कर रही है। पिछले छह दषकों में देष ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय उपलब्यिाँ हासिल की हैं जैसे औसत आयु में दुगुनी वृद्धि, माता एवं षिषु मृत्यु दर में कमी, कई गंभीर बीमारियों का खात्मा। इस दौरान सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं का देषव्यापी विस्तार हुआ। असाध्य रोगों के लिए अनुसंधान केन्द्र स्थापित किए गए। निवारक टीकों का विकास किया गया और देषव्यापी टीकाकरण अभियान चले। इन उपलब्धियों के बाद भी देष स्वास्थ्य रक्षा के क्षेत्र में अभी बहुत पीछे है। विकसित देषों की बात तो दूर भारत विकासषील देषों में भी पिछली पंक्ति में नजर आता है। पिछले एक दषक में बढ़ती जनसंख्या व बीमारियों के अनुपात में स्वास्थ्य सुविधाएं घटी हैं। इस दौरान बेड घनत्व (प्रति हजार जनसंख्या पर अस्पतालों में बेड की उपलब्धता) 7 प्रतिषत कम हो गया। देष के छह राज्यों (मध्य प्रदेष, उड़ीसा, उत्तर प्रदेष, बिहार, जम्मू व कष्मीर, हरियाणा) में बेड की उपलब्धता राष्ट्रीय औसत (0.86 बेड प्रति हजार) का दो-तिहाई है। चार दक्षिणी राज्यों (कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेष) में देष की 20 प्रतिषत जनसंख्या निवास करती है लेकिन यहाँ देष के एक-तिहाई डाक्टर व 40प्रतिषत नर्सें हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य उपकेन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में स्वास्थ्यगत आधारभूत ढांचे की भारी कमी है। इन केन्द्रों में 62 प्रतिषत विषेषज्ञ चिकित्सकों, 49 प्रतिषत प्रयोगषाला सहायकों ओर 20 प्रतिषत फार्मासिस्टों की कमी है। यह कमी दो कारणों से है- पहला, आवष्यकता की तुलना में स्वीकृत पद कम हैं। दूसरा, बेहतर कार्यदषा की कमी और सीमित अवसरों के कारण योग्य चिकित्सक ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के प्रति अनिच्छुक रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यगत सुविधाओं की कमी का एक बड़ा कारण बिजली, सड़क, परिवहन के साधनों की कमी है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की पहुँच बनाने के उद्देष्य से 1983 की स्वास्थ्य नीति में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई। इसका परिणाम यह हुआ कि निजी क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ। आज देष में 15 लाख स्वास्थ्य सुविधा प्रदाता हैं जिनमें से 13 लाख प्रदाता निजी क्षेत्र से संबंधित है। ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों में दवाई, प्रषिक्षित कर्मचारियों, जाँच सुविधाओं और उचित प्रबंधन का भारी अभाव है। देष की मात्र 12 प्रतिषत जनसंख्या स्वास्थ्य बीमा सुविधा लेती है। यद्यपि निजी स्वास्थ्य बीमा सेवा 40 प्रतिषत वार्षिक की गति से बढ़ रही है फिर भी जागरूकता की कमी, ऊँची प्रीमियम दर जैसे कारणों से देष की विषाल जनसंख्या इन सुविधाओं का लाभ नहीं ले पाती। किसी रोगी को अस्पताल में दाखिल करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 19 किलो मीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि षहरी क्षेत्रों में 6 किलो मीटर। सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 5.9 किलो मीटर तथा षहरी क्षेत्रों में 2.2 किलो मीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। देष की 72 प्रतिषत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं दयनीय दषा में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में झोलाछाप डाक्टर अपनी-अपनी दुकान सजाकर बैठे हैं तथा ग्रामीणों को लूट रहे हैं। कई बार ये अर्थ का अनर्थ कर देते हैं जिससे रोगी मौत के मुंह में चले जाते हैं। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की संरचना तो विद्यमान है लेकिन आवष्यक सुविधाएं (डाक्टर, नर्स, जाँच मषीनें) नदारद हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन की षुरूआत 12 अप्रैल, 2005 को की गई। इसका उद्देष्य दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक सस्ती, सुगम और उच्च गुणवत्ता युक्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है। इस मिषन के तहत प्रतिकूल स्वास्थ्य सुविधाएं संतोषजनक नहीं हैं, उनपर विषेष ध्यान दिया जाना आवष्यक है। मिषन का उद्देष्य समुदाय के स्वामित्व के अधीन पूर्णतया कार्यषील विकेन्द्रित स्वास्थ्य प्रणाली की स्थापना की जाए ताकि ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग के वर्तमान अनुपात को 20 प्रतिषत से बढ़ाकर 75 प्रतिषत किया जा सके। इसमें स्वास्थ्य रक्षा के लिए सहायक गतिविधियों पर भी ध्यान दिया जाए। जैसे पानी, षिक्षा, पोषण, सामाजिक और लिंग समानता। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का 2-3 प्रतिषत खर्च किया जाए जो फिलहाल 0.9 प्रतिषत है। इस क्षेत्र में केन्द्र सरकार अपना बजट बढ़ा रही है लेकिन राज्य सरकार को भी अपने-अपने स्वास्थ्य बजट में प्रतिवर्ष कम से कम 10 प्रतिषत वृद्धि करनी चाहिए। वर्तमान समय में स्वास्थ्य के क्षेत्र में केन्द्र और राज्य सरकारों के खर्च का अनुपात 80ः20 है। आवष्यकता यह है कि राज्यों के स्वास्थ्य विभाग इस मिषन का निर्बाध रूप से चलाने के लिए धन के प्रवाह को बढ़ायें। वर्तमान समय में राज्य को विŸाीय कमी है, इसलिए धन का आवंटन समय पर नहीं हो पा रहा है। इस मिषन के प्रभावी क्रियान्वयन में विŸा का अभाव बाधा है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन में आयुष (अर्थात् आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध तथा होम्योपैथी) को चिकित्सा प्रणाली की मुख्यधारा में लाया जाए। ये सुविधाएं न केवल सहज सुलभ व सस्ती हैं अपितु छोटी-मोटी बीमारियों में अचूक लाभ दे सकती है। आयुष विभाग एक ऐसी कार्यनीति चलावे जिसमें स्वास्थ्य उपकेन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर आयुष का भरपूर इस्तेमाल किया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण के उपयुक्त प्रयासों के बाद भी गाँव और षहर के बीच की खाई निरंतर बढ़ती जा रही है। इसका कारण है कि भारत में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च विष्व में सबसे कम है जबकि निजी खर्च के मामले में भारत विष्व का अग्रणी देष है। निजी खर्च नगरों एवं महानगरों तक सीमित है। उदारीकरण के बाद से स्वास्थ्य पर निजी खर्च में तेजी से वृद्धि हुई है। पिछले एक दषक में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च में निजी क्षेत्र की भागीदारी 60 प्रतिषत से बढ़ कर 80 प्रतिषत हो गई है। इससे गाँव और षहर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। निजी क्षेत्र के तीव्र प्रसार के पीछे जहाँ सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाओं व प्रबंधन की कमी है वहीं लोगों की मानसिकता भी दोषी है। दरअसल, लोगों में यह धारणा गहरे पैठ गई है कि अच्छा इलाज सिर्फ निजी अस्पतालों में ही हो सकता है। इसी सोच का लाभ निजी स्वास्थ्य क्षेत्र उठा रहा है। परंपरागत बीमारियों के साथ-साथ संक्रामक बीमारियों के फैलाव और बुजुर्गों की स्वास्थ्य रक्षा ने भारतीय चिकित्सा क्षेत्र के समक्ष नई चुनौतियों को प्रस्तुत किया है। संक्रामक बीमारियों का फैलता जाल भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक एवं मानव संसाधन संबंधी हानि हो सकता है। असमानता, गरीबी, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुँच के कारण नई-पुरानी बीमारियाँ ग्रामीणों के जीवन को दुष्कर बना रही हैं। इन परिस्थितियों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में गाँव व षहर के बीच की बढ़ती खाई निष्चित रूप से चिंता का विषय है। इस खाई को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ बनाकर ही पाटा जा सकता है। किन्तु कतिपय आधारभूत समस्याएं अब भी यथावत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल, परिवहन तथा संचार साधनों की कमी, चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कार्मिकों का ग्रामीण क्षेत्रों में कम ठहराव, प्रोन्नति की क्षीण संभावना एवं विŸाीय संसाधनों की कमी इत्यादी समस्याएं ग्रामीण स्वास्थ्य एवं विकास को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। निर्धनता तथा सामाजिक पिछड़ापन जटिल समस्याएं हैं। सम्पूर्ण विकास से संबंधित सभी क्षेत्रों की कल्याणकारी विकास योजनाओं का एकीकरण कर दिया जाए तो सामाजिक-आर्थिक विकास का लक्ष्य बेहतर ढंग से तथा षीघ्र प्राप्त किए जा सकेंगे। इसके लिए जहाँ एक ओर केन्द्र व राज्य सरकारों को समन्वित ढंग से प्रयास करने होंगे वहीं जनसामान्य के लिए जरूरी हो गया है कि हम अपनी जीवनषैली में सुधार लायें। नियमित व्यायाम और संतुलित खान-पान को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनायें। अपने आसपास के वातावरण को साफ-सुथरा रखें। दूषित भोजन खाने से बचें। यही नहीं, हमें अपनी प्राचीन अमूल्य धरोहरों के महत्व को भी नए सिरे से समझना होगा। लेकिन वास्तविकता यही है कि आज के भौतिकवादी युग में हर आदमी केवल एक-दूसरे से आगे निकलने और पैसा कमाने की होड़ में जुटा है और ऐसा वह अपने स्वास्थ्य की कीमत पर करने से भी नहीं चुक रहा। षहरों में भौतिकवाद लोगों के स्वास्थ्य को निगल रहा है तो गाँवों में निरक्षरता, गरीबी और अंधविष्वास के पसरे पाँवों के कारण आम ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पा रहा।
(डा॰ जगन्नाथ मिश्र)
Ĭ